तुम्हारे नाम की रेखा नहीं है, मिरे हाथों में वरना क्या नहीं है।

चराग़-ए-सुख़न के मासिक तरही मुशायरे में शायरों ने बांधा समां

बदायूँ। बीती रात चराग-ए सुखन संस्था द्वारा मोहल्ला सोथा स्थित कार्यालय फरशोरी हाउस पर मासिक तरही मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें हाजिर शायरों ने बेहतरीन कलाम सुनाकर खूब वाहवाही लूटकर समां बांध दिया। डॉ दानिश बदायूंनी ने नात-ए-पाक पढ़कर नशिस्त का आगाज किया। 

सदारत कर रहे सादिक अलापुरी ने सुनाया-

अभी तक जेबो दामाँ हैं सलामत,                                               जुनूँ हद को अभी पहुंचा नहीं है।

वरिष्ठ शायर सुरेन्द्र नाज ने कहा-

तुम्हारे नाम की रेखा नहीं है,                                                   मिरे हाथों में वरना क्या नहीं है।

अल्हाज आज़म फरशोरी ने कहा-

तेरे दामन पे गर धब्बा नहीं है,                                                 मेरा किरदार भी मैला नहीं है।

संयोजक डॉ दानिश बदायूंनी ने ग़ज़ल सुनाई - 

सुनेगा वो भला कैसे किसी की,                                                 जो बेटा बाप की सुनता नहीं है।

कुमार आशीष ने ग़ज़ल पढी-

तू मेरा हो के भी मेरा नहीं है,                                                        ये रिश्ते की तो परिभाषा नहीं है।

संचालक अरशद रसूल ने कहा-

अगर जहमत न हो इंसान बन जा,                                               ये मेरी राय है फतवा नहीं है।

शायर शम्स मुजाहिदी बदायूंनी ने कहा-

है बदला शम्स हर इक शय का लेकिन,                                 मुहब्बत को कोई बदला नहीं है।

इसके अलावा शहाबुद्दीन शब्बू भाई, रजत गौड़ आदि मौजूद रहे। आखिर में कार्यक्रम संयोजक डॉ दानिश बदायूंनी ने सभी मेहमानों का शुक्रिया अदा किया। सादिक अललपुरी ने बताया कि अगला तरही मुशायरा शम्स मुजाहिदी के संयोजन में 18 अप्रैल को होगा जिसका मिसरा है -

     "दास्तां लिखने लगा हूं अब ज़माने के लिए।"



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