शेरवानी की 50वीं वर्षगांठ पर यूनिवर्सिटी की रवायतों को बचाने की अपील
                    (मौलाना हकीम अफ़रोज़ खान अलीग)


बदायूं।l शेरवानी के यूनिवर्सिटी से जुड़े 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर ए.एस.एफ. ग्रुप हेल्थकेयर के संस्थापक एवं ककराला विकास मंच के अध्यक्ष और अपराध निरोधक समिति थाना अलापुर के अध्यक्ष मौलाना हकीम अफ़रोज़ खान अलीग ने यूनिवर्सिटी की पुरानी रवायतों और शेरवानी के प्रति छात्रों में कम होते जा रहे उत्साह पर गहरी चिंता व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि शेरवानी केवल एक पोशाक नहीं, बल्कि यूनिवर्सिटी की पहचान, उसकी तहज़ीब, अदब और गौरवशाली परंपरा का अहम हिस्सा रही है। एक समय था जब नए छात्र यूनिवर्सिटी में दाखिल होने के साथ ही यहां की रवायतों और तौर-तरीकों से परिचित होते थे। सीनियर और जूनियर छात्रों के बीच परिचय की परंपरा के माध्यम से नई पीढ़ी को यूनिवर्सिटी की संस्कृति, इतिहास और उसकी अनमोल विरासत से जोड़ने का अवसर मिलता था।

मौलाना हकीम अफ़रोज़ खान अलीग ने कहा कि सीनियर-जूनियर इंट्रोडक्शन की वह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गई और उसके साथ ही यूनिवर्सिटी की कई पुरानी रवायतें भी कमजोर पड़ती चली गईं। आज नए छात्रों को इन परंपराओं से परिचित कराने का कोई व्यवस्थित माध्यम नहीं रह गया है। शायद यही कारण है कि शेरवानी जैसी यूनिवर्सिटी की विशिष्ट पहचान से जुड़ी खूबसूरत परंपरा भी धीरे-धीरे समाप्त होती दिखाई दे रही है।

उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी का रंग और उसकी पहचान सिर्फ उसकी इमारतों से नहीं बनती, बल्कि वहां की तहज़ीब, अदब, पहनावे और रवायतों से बनती है। शेरवानी इसी पहचान की एक खूबसूरत निशानी रही है।

मौलाना हकीम अफ़रोज़ खान अलीग ने वर्ष 2003 का अपना एक यादगार अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब वह अपने मुल्क से हजारों किलोमीटर दूर, सात समंदर पार ब्रुनेई दारुस्सलाम शेरवानी पहनकर नमाज़ अदा करने गए, तो वहां मौजूद लोगों ने उनकी शेरवानी को देखकर बड़ी गर्मजोशी से सलाम किया और खैरियत मालूम की। एक अनजान मुल्क में भी शेरवानी ने अजनबियों के बीच पहचान और अपनापन पैदा कर दिया।

उन्होंने कहा कि शेरवानी की अपनी एक ऐसी पहचान है कि मुल्क से दूर, सात समंदर पार भी इसे देखकर हिंदुस्तान और खासतौर पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की तहज़ीब और परंपरा का एहसास होता है। यह केवल एक पहनावा नहीं, बल्कि एक ऐसी पहचान है जो दूरियों के बावजूद दिलों को करीब ले आती है और अजनबियों के बीच भी अपनापन पैदा कर देती है।

मौलाना हकीम अफ़रोज़ खान अलीग ने यूनिवर्सिटी प्रशासन, शिक्षकों, पूर्व छात्रों और वर्तमान विद्यार्थियों से भावनात्मक अपील की कि हम अपनी पुरानी और अच्छी रवायतों को यूं ही खत्म न होने दें। उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने और उनसे छात्रों को जोड़ने के लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए। सप्ताह में कम से कम एक दिन ऐसा निर्धारित किया जा सकता है, जब छात्रों को शेरवानी पहनने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाए। इसी तरह यूनिवर्सिटी में किसी विशेष समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रम अथवा विशिष्ट अतिथि के स्वागत जैसे अवसरों पर शेरवानी पहनकर शामिल होने की परंपरा को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य किसी परंपरा को किसी पर थोपना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को उसकी अहमियत समझाना और अपनी ऐतिहासिक पहचान पर गर्व करना सिखाना है। जब छात्र अपनी तहज़ीब और रवायतों को जानेंगे, तभी वे उन्हें दिल से अपनाएंगे और आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाएंगे।

मौलाना हकीम अफ़रोज़ खान अलीग ने कहा, “रवायतें सिर्फ याद करने के लिए नहीं होतीं, बल्कि उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना और उनकी पहचान को जिंदा रखना भी हमारी जिम्मेदारी है। अगर आज हमने अपनी पहचान से जुड़ी इन खूबसूरत रवायतों को संभालने की कोशिश नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियां शायद इन्हें केवल तस्वीरों और किताबों में ही ढूंढेंगी।”



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